रविवार, 7 जुलाई 2013

अवसाद (Depression)



हर व्यक्ति कभी न कभी दुखी या उदास हो जाता है, लेकिन अक्सर यह अहसास क्षणिक होता है और कुछ ही दिनों में वह इस अहसास से उबर आता है ! जब कोई व्यक्ति अवसाद  संबंधी विकार से पीड़ित होता है, तो यह विकार उस व्यक्ति के रोजमर्रा के जीवन और उसके सामान्य कामकाज में बाधा डालता है तथा उस व्यक्ति और उसके परिवारजनॉ के दुखों का कारण बन जाता है !

अवसाद एक सामान्य, लेकिन गंभीर रोग है और इससे पीड़ित लोगों को सही इलाज की ज़रूरत होती है ! 

ऐसे व्यक्ति, जो तनाव से पीड़ित होते हैं, वे अक्सर अपना इलाज नहीं कराते हैं, और अवसाद के लक्षणों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं ! जबकि अधिकतर मामलों में अवसाद से गंभीर रूप से पीड़ित मरीज भी इलाज से बेहतर हो सकते हैं ! इस रोग के लिए हुई गहन शोधों से इस रोग से ग्रसित लोगों के इलाज के लिए अनेक औषधियां, साय्कोथेरेपी  और इलाज के अन्य तरीके ईजाद हुए हैं !

अवसाद या डिप्रेशन का तात्पर्य मनोविज्ञान के क्षेत्र में मनोभावों संबंधी दुख से होता है। इसे रोग या सिंड्रोम की संज्ञा दी जाती है। आयुर्विज्ञान में कोई भी व्यक्ति अवसादग्रस्त अवस्था में स्वयं को लाचार और निराश महसूस करता है। उस व्यक्ति-विशेष के लिए सुख, शांति, सफलता, खुशी यहाँ तक कि संबंध तक बेमानी हो जाते हैं। उसे सर्वत्र निराशा, तनाव, अशांति, अरुचि प्रतीत होती है। अवसाद के भौतिक कारण भी अनेक होते हैं। इनमें कुपोषणआनुवांशिकताहार्मोनमौसम, तनावबीमारी, नशा, अप्रिय स्थितियों में लंबे समय तक रहना, पीठ में तकलीफ आदि प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त अवसाद के 90 प्रतिशत रोगियों में नींद की समस्या होती है।

 अवसाद के कई प्रकार पाए जाते हैं। जिनमे मेजर डिप्रेसिव डिसोर्डरऔर डीस्थ्यिमिक डिसोर्डरहैं।

मेजर डिप्रेसिव डिसोर्डर

 इसे मुख्य अवसाद भी कहा जाता है। इस अवसाद से ग्रस्त व्यक्ति में मिश्रित लक्षण नज़र आते हैं और यह अवसाद रोगी के काम करने, सोने, पढ़ने, खाने और आनंद लेने की क्षमता को प्रभावित करके कामकाज में प्रभाव डालता है। इस प्रकार का अवसाद व्यक्ति को सामान्य रूप से कामकाज नहीं करने देता है। इस तरह का अवसाद किसी व्यक्ति के जीवनकाल में सिर्फ़ एक ही बार उत्पन्न होता है, लेकिन अधिकतर इस अवसाद की पुनरावृत्ति उस व्यक्ति के जीवनपर्यन्त होती रहती है।

 डीस्थ्यिमिक डिसोर्डर 

 इस अवसाद को डीस्थेमियाभी कहते हैं। इस अवसाद की अवधि दो या दो वर्ष से अधिक समय तक रहती है। लेकिन इसके लक्षण कम गंभीर होने के कारण व्यक्ति अशक्त तो नहीं होता है, लेकिन उसे कामकाज सामान्य रूप से संपन्न करने में बाधा हो सकती है, और वह खुद को अस्वस्थ महसूस कर सकता है। इसके शिकार व्यक्ति मेजर डिप्रेसिव डिसोर्डरका भी अपने जीवनकाल में अनुभव कर सकते हैं।

अवसाद रोग के कुछ प्रकार ऊपर बताई गई विशेषताओं से थोड़ा अलग विशेषता दर्शाते हैं या वे किसी ख़ास हालातों में विकसित हो सकते हैं। हालांकि सभी मनोचिकित्सक इस बात में एकमत नहीं हैं कि अवसाद के इन विभिन्न प्रकारों का किस तरह चरित्रचित्रण करें या कैसे परिभाषित करें।

इनमे शामिल हैं-

  • सायकोटिक डिप्रेशन – जब एक अति गंभीर अवसाद संबंधी बीमारी के साथ साथ कुछ प्रकार की मनोविकृति भी जुडी हुई होती है, तब अवसाद के इस प्रकार को सायकोटिक डिप्रेशन के नाम से जाना जाता है। मनोविकृति में सच्चाई से अनजान रहना, मतिभ्रम होना और किसी भी बात का आभास होना जैसी मनोदशा शामिल हैं।

  • पोस्टपार्टम डिप्रेशन – यदि शिशु के जन्म के बाद एक नई माँ में एक महीने के भीतर में अवसाद संबंधी लक्षण प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं, तब अवसाद के इस प्रकार की पहचान पोस्टपार्टम डिप्रेशनके तौर पर होती है। अनुमान के अनुसार करीब 10 से 15 प्रतिशत स्त्रियाँ प्रसव के बाद पोस्टपार्टम डिप्रेशनका अनुभव करती हैं।

  • सीज़नल अफेक्टिव डिसोर्डर (एस-ए-डी) - यह अवसाद संबंधी ऐसी बीमारी है, जो सर्दी के मौसम के दौरान प्रकट होती है, जब हमें प्राकृतिक रूप से सूर्यप्रकाश कम मात्रा में प्राप्त होता है। आम तौर पर बसंत और गर्मियों के मौसम में अवसाद का असर कम हो जाता है। सीज़नल अफेक्टिव डिसोर्डर’ (एस-ए-डी) को शायद प्रकाश (लाईट) थेरेपीसे प्रभावशाली तरीके से ठीक किया जा सकता है, लेकिन इस अवसाद से पीड़ित करीब आधे लोगों की संख्या सिर्फ़ प्रकाश थेरेपीसे ही ठीक नहीं की जा सकती है। अवसादरोधी दवा उपचार और मनश्चिकित्सा (साय्कोथेरेपी) की मदद से एस-ए-डी के लक्षणों को घटाया जा सकता है। यदि आवश्यक हो, तो इन उपायों के साथ प्रकाश थेरेपीको भी जोड़ा जाता है।
  • बाइपोलर डिसोर्डर – अवसाद के इस प्रकार को उन्मादी अवसाद संबंधी बीमारी भी कहा जाता है। यह अवसाद के अन्य प्रकार मेजर डिप्रेशनया डीस्थेमियाजितना साधारण नहीं है। बाइपोलर डिसोर्डरके अंतर्गत रोगी का मूड अचानक अत्यधिक उच्च स्तर (जैसे कि उन्माद’) से अत्यधिक निम्न स्तर (जैसे कि अवसाद’) तक बदल जाता है।

अवसाद के लक्षण          


यह ज़रूरी नहीं है कि अवसाद से पीड़ित मरीजों को समान लक्षणों का अनुभव हो ! रोग के लक्षणों की तीव्रता, बारंबारता और अवधि उस व्यक्ति और उसकी बीमारी पर निर्भर होते हुए अलग अलग होती है !    

अवसाद के लक्षण

  • लगातार उदासी, बैचैनी या रिक्तता का एहसास
  • निरंतर निराश रहना या निराशावादी होना
  • शर्मिंदगी, अपराधबोध, मूल्यहीनता, अयोग्यता और लाचारी का भाव
  • अत्यधिक बैचैनी और परेशानी
  • किसी भी कार्यों में दिलचस्पी न लेना  
  • थकान और ऊर्जा की कमी
  • एकाग्रता की कमी, बातें भूल जाना, निर्णय न ले पाना !
  • अनिंद्रा की शिकायत, सुबह जल्दी नींद खुलना या बहुत नींद आना !
  • अधिक मात्रा में भोजन का सेवन करना या भोजन में बिल्कुल भी रूचि न होना
  • मन में आत्महत्या के विचार आना या आत्महत्या की कोशिश करना
  • शरीर में लगातार दर्द का एहसास होना, सिरदर्द, पेट में मरोड या ऐंठन होना, खाना न पचना, इलाज के बावजूद अपच की समस्या दूर न होना!

आयु से भी संबंध है अवसाद का

-अधेड़पन और अवसाद में है सीधा रिश्ता
-44 के करीब चरम पर रहती है अवसादग्रस्त होने की आशंका

आप आधी जिंदगी खुशी-खुशी गुजार चुके हैं, लेकिन अब खुशी रूठ गई है। खुश रहने के लिए आपके पास सब कुछ है, फिर भी अवसाद आपको गिरफ्त में ले चुका है। आपको इसका कारण ढूंढे नहीं पता चल रहा है, लेकिन विशेषज्ञ इसकी वजह जान चुके हैं। उनके मुताबिक, आपकी समस्या है आपकी उम्र। एक शोध से पता चला है कि अधेड़पन का अवसाद से सीधा संबंध है।

अमेरिका और ब्रिटेन के शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि अधेड़ उम्र में पहुंचने के बाद व्यक्ति के अवसादग्रस्त होने की आंशका बढ़ जाती है। करीब 44 साल की उम्र होने पर तो यह आशंका चरम पर होती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि जिंदगी के शुरुआती और आखिरी दौर में व्यक्ति खुशहाल रहता है, जबकि बीच के हिस्से में दुख और अवसाद ही आते हैं। हालांकि ऐसा क्यों होता है, इसका पता लगाने में शोधकर्ता फिलहाल विफल रहे हैं।

शोधकर्ताओं का नतीजा 80 देशों के करीब 20 लाख से अधिक लोगों से संबंधित आंकड़ों का अध्ययन करने के बाद आया है। अध्ययन में कहा गया है कि अक्सर लोग प्रौढ़ावस्था में, खास कर 44 साल की उम्र के आसपास सबसे ज्यादा अवसादग्रस्त महसूस करते हैं। उनका कहना है कि लोग मानते हैं कि जैसे-जैसे वे मृत्यु के करीब जाएंगे, खुशियां उनसे दूर होती जाएंगी। लेकिन सच इसके ठीक उलट है। प्रौढ़ावस्था में लोगों की खुशियों और अच्छे मानसिक स्वास्थ्य का स्तर कम होता है। लेकिन यह सब अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे होता है। लेकिन 70 की उम्र तक पहुंचते- पहुंचते एक बार फिर व्यक्ति 20 साल के युवा की तरह खुश और दिमागी तौर पर चुस्त हो जाता है।

 मोटापे व डिप्रेशन में करीबी नाता


मोटापा और डिप्रेशन (अवसाद) एक ही सिक्के के दो पहलू  हैं। एक अध्ययन की मानें तो अगर आप में इन दोनों में से किसी एक की मौजूदगी है तो दूसरा खुद-ब-खुद आपके पास चला आता है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति मोटा है तो अक्सर डिप्रेशन उसे घेर लेता है। इसी तरह डिप्रेशन के शिकार लोग मोटापे की गिरफ्त में आ जाते हैं। अपने अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि मोटे लोगों के अवसाद से ग्रसित होने की संभावना अधिक होती है, क्योंकि वे खुद को हमेशा दूसरों की अपेक्षा कमतर आंकते हैं। मोटे लोग अक्सर नकारात्मक सोच रखते हैं जो अवसाद का प्रमुख कारण है।

'क्लीनिकल साइकोलाजी' जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार महिलाएं और उच्च वर्ग के लोग अपने स्वास्थ्य को लेकर ज्यादा चिंतित रहते हैं। शोधकर्ताओं ने बताया कि डिप्रेशन के शिकार लोगों के हार्मोन और प्रतिरक्षा तंत्र में कुछ बदलाव आते हैं जिससे वे मोटापे की ओर बढ़ने लगते हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार डिप्रेशन और मोटापे से निजात पाने के लिए बेहतर इलाज की जरूरत पड़ती है। उन्होंने कहा कि दोनों का इलाज एक साथ किया जाना चाहिए। शोधकर्ताओं का मानना है कि ऐसे लोगों को योग और व्यायाम से काफी लाभ मिल सकता है।

अवसाद के कारण


मनोविश्लेषकों के अनुसार अवसाद के कई कारण हो सकते हैं। यह मूलत: किसी व्यक्ति की सोच की बुनावट या उसके मूल व्यक्तित्व पर निर्भर करता है। अवसाद लाइलाज रोग नहीं है। इसके पीछेजैविकआनुवांशिक और मनोसामाजिक कारण होते हैं। यही हीं जैवरासायनिक असंतुलन के कारण भी अवसाद घेर सकता है। 

अनेक शोधों के अनुसार अवसाद से संबंधित बीमारियाँ मस्तिष्क के विकार हैं ! एम-आर-आई जैसी मस्तिष्क को जांचने की तकनीक यह बताती है कि अवसाद और तनाव से पीड़ित लोगों के दिमाग उन लोगों से अलग होते हैं, जो इस बीमारी से पीड़ित नहीं होते हैं ! मस्तिष्क का वह हिस्सा, जो मनोदशा, विचार, निंद्रा, भूख और व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए ज़िम्मेदार होता है, असामान्य तरीके से काम करता हुआ प्रतीत होता है ! इसके अलावा मस्तिष्क की कोशिकाएं जिन आवश्यक न्यूरो ट्रांसमीटर केमिकल का उपयोग संवाद के लिए करती हैं, वे असंतुलित पाए जाते हैं ! लेकिन ये तस्वीरें यह नहीं बताती हैं कि अवसाद क्यों उत्पन्न हुआ है।

अवसाद के कुछ प्रकारों में परिवार में बसने की प्रवृति पाई जाती है, जिससे कि इस रोग को आनुवंशिकता से भी जोड़ा जा सकता है ! हालांकि अवसाद के शिकार वे लोग भी बन सकते हैं, जिनके परिवार का कोई भी सदस्य अवसाद से पीड़ित नहीं है ! आनुवंशिकता पर हुए शोध इस बात का इशारा करते हैं कि आनुवंशिकता अन्य घटकों के साथ जुडकर अवसाद के खतरे को और अधिक बढ़ा देते हैं !  

इसकी अधिकता के कारण रोगी आत्महत्या तक कर सकते हैं। इसलिए परिजनों को सजग रहना चाहिए और उनके परिवार का कोई सदस्य गुमसुम रहता है, अपना ज्यादातर समय अकेले में बिताता है, निराशावादी बातें करता है तो उसे तुरंत किसी अच्छे मनोचिकित्सक के पास ले जाएं। उसे अकेले में न रहने दें। हंसाने की कोशिश करें।

मनोविश्लेषकों के अनुसार प्राकृतिक तौर पर महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा अवसाद की शिकार कम बनती हैं, लेकिन अवांछित दबावों से वह इसकी शिकार हो सकती हैं। इस कारण प्रायः माना जाता है कि महिलाओं को अवसाद जल्दी आ घेरता है। इसके विपरीत पुरुष अक्सर अपनी अवसाद की अवस्था को स्वीकार करने से संकोच करते हैं। मोटे अनुमान के अनुसार दस पुरुषों में एक जबकि दस महिलाओं में हर पांच को अवसाद की आशंका रहती है। 

अवसाद अक्सर दिमाग के न्यूरोट्रांसमीटर्स की कमी के कारण भी होता है। न्यूरोट्रांसमीटर्स दिमाग में पाए जाने वाले रसायन होते हैं जो दिमाग और शरीर के विभिन्न हिस्सों में तारतम्यता स्थापित करते हैं। इनकी कमी से भी शरीर की संचार व्यवस्था में कमी आती है और व्यक्ति में अवसाद के लक्षण दिखाई देते हैं। इस तरह का अवसाद आनुवांशिक होता है। अवसाद के कारण निर्णय लेने में अड़चन, आलस्य, सामान्य मनोरंजन की चीजों में अरुचि, नींद की कमी, चिड़चिड़ापन या कुंठा व्यक्ति में दिखाई पड़ते हैं। अवसाद के कारणों में इसका एक पूरक चिंता (एंग्ज़ायटी) भी है।

इसके अलावा मानसिक आघात, कटु अनुभव, सदमा, किसी करीबी रिश्तेदार की मृत्यु, एक तनावयुक्त संबंध, या कोई भी तनावदायक स्थिति अवसाद का कारण बन सकते हैं ! ऐसी स्थिति में भविष्य में अवसाद के दौरे बिना किसी कारणों से भी हो सकते हैं !

खतरनाक है अवसाद


अवसाद का मतलब होता है कुण्ठा, तनाव, आत्महत्या की इच्छा होना। अवसाद यानी डिप्रेशन मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य के लिए हानिकारक है, इसका असर स्‍वास्‍थ्‍य पर भी पड़ता है और व्यक्ति के मन में अजीब-अजीब से ख्या‍ल घर करने लगते हैं। वह चीजों से डरने और घबराने लगता है। आइए जानें कैसे खतरनाक है अवसाद।


  • अवसाद के चलते व्यक्ति का न सिर्फ मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य बल्कि शारीरिक स्‍वास्‍थ्‍य भी बिगड़ने लगता है।
  • अवसाद में रहते हुए व्यक्ति की आत्महत्या की इच्छा प्रबल होने लगती है।
  • व्यक्ति के मन में हीनभावना होना, कुण्ठा पनपना, अपने को दूसरों से कम आंकना, तनाव लेना सभी अवसाद के लक्षण है।
  • व्यक्ति अवसाद के कारण अपने काम पर सही तरह से फोकस नहीं कर पाता।
  • कुछ समय पहले के आंकड़ो पर गौर करें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया के ज्यादातर बड़े शहरों में डिप्रेशन की समस्या का बहुत तेजी से विस्तार हुआ है। भारत जैसे विकासशील देशों में 10 पुरुषों में से एक व 5 महिलाओं में से एक अपनी जिंदगी के किसी न किसी पड़ाव पर डिप्रेशन का शिकार बनते हैं।
  • कोई व्यक्ति अवसाद से ग्रसित रहता है तो उसे डिमेंशिया होने की आशंका अधिक बढ़ जाती है।
  • अवसाद से हृदय और मस्तिष्क को भी भारी खतरा उत्पन्न हो सकता है।
  • अवसाद और मधुमेह से पीड़ित लोगों में दिल से जुड़ी बीमारियां, अंधापन और मस्तिष्क से जुड़ी बीमारियां होने की आशंका बनी रहती है।
  • डिप्रेशन से हार्ट डिज़ीज जैसे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।
  • इम्यून सिस्टम पर अतिरिक्त असर पड़ता है।
  • मानसिक बीमारी से हृदय संबंधी बीमारी के चलते मौत का खतरा 75 साल की उम्र तक दो गुना अधिक होता है।
  • अवसाद से व्यक्ति किसी पर जल्दी से भरोसा नहीं कर पाता।
  • वह अधिक गुस्सेवाला और चिड़चिड़ा हो जाता है।

अवसाद का निदान


अगर आप अवसाद से पीड़ित हैं, तो आपको थकान, लाचारी, और नाउम्मीदी का एहसास हो सकता है ! इन हालातों में आपको खुद की मदद करना अत्यंत मुश्किल सा लग सकता है ! लेकिन यह जानना बेहद ज़रूरी है कि ये सारी मनोदशाएँ अवसाद का हिस्सा हैं और ये सही स्थिति को ठीक ढंग से नहीं दर्शाती हैं! जैसे जैसे आप अपने अवसाद को पहचानने लग जाएंगे और उपचार की शुरूआत कर देंगे, तब नकारात्मक विचार गायब होते चले जाएंगे ! 

खुद की मदद करें

  • खुद को हल्के फुल्के कार्यों में या व्यायाम में व्यस्त रखें ! ऐसे कार्य करें, जिसमे आपको आनंद मिले, जैसे कि फिल्म देखना, बाल्गेम खेलना ! सामाजिक, धार्मिक या अन्य कार्यकमों में हिस्सा लें !
  • अपने लिए यथार्थवादी लक्ष्य निर्धारित करें !
  • बड़े बड़े कार्यों को छोटे छोटे हिस्सों में बांटे, कुछ काम की प्राथमिकताएं निर्धारित करें और ऐसा कार्य करें, जिसे संपन्न करने की आपमें पूर्ण क्षमता हो !
  • अन्य लोगों के साथ समय बिताएं और किसी भरोसेमंद मित्र या रिश्तेदार के साथ अपनी गुप्त बातों को बताएं ! अपने आपको सबसे अलग थलग करने की कोशिश न करें और दूसरों को आपकी मदद करने दें ! 
  • इस बात की उम्मीद रखें कि आपकी मनोदशा धीरे धीरे सुधरेगी ! शीघ्रता से सुधरने की आशा न रखें ! अपने अवसाद से एक झटके में बाहर आने के चमत्कार की अपेक्षा न करें ! अक्सर ऐसा पाया जाता है कि इलाज के दौरान मनोदशा में ख़ास बदलाव आने से पहले मरीज की नींद और भोजन करने की इच्छा में सुधार आता है !
  • महत्वपूर्ण निर्णयों को टालें जैसे कि शादी करना या तलाक से संबंधित बातें या नौकरी बदलना ! अपने निर्णयों को अपने उन शुभचिंतकों के साथ बाटें, जो आपको भलीभांति जानते हों और आपकी स्थिति का सही आकलन करें !
  • इस बात को हमेशा ध्यान में रखें कि इलाज के दौरान जैसे जैसे आपकी स्थिति में सुधार होने लगेगा, वैसे वैसे आपके मन में नकारात्मक विचारों के स्थान पर सकारात्मक विचार आने लगेंगे!



 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें